Wednesday, February 9, 2011

वोह समझे ....

मैं तो कर रही थी बयां हाले दिल अपना
वोह समझे की खूब शेर ओ शायरी की है..!!!
जब आसूं लफ्ज़ बन उतरे  कलम से
वोह समझे  की मैने कविता की है..!!!!

पूछती है दुनिया मुझसे, ये लफ्ज़ कैसे पिरोती हो तुम?
क्या जवाब दूं... कभी शब्द, यूं टिटोले न हम..
हाँ,... लिख देती हूँ... कभी कभी जो मन का विचार है..
समुंदर को भी भला क्या उसकी लेहेरों का आभास है ?
कब बनती... कब बिगडती..... यह कहाँ उसके हाथ है...
गरजते बदलते मौसम के साथ का प्रभाव है...

शब्द भी कुछ यूं ही मेरे मन का साज़ है,
कब सजे कब बजे, मन का प्रभाव है..
दिल की राय तो सिर्फ गूगा एहसास है ,
महसूस तो करोगे फिर भी लफ्ज़ का मोहताज है..
इस एहसास को सिर्फ शकल ओ सूरत दी है
और वो कहते हैं की मैने कविता की है..

जब आसूं लफ्ज़ बन उतरे कलम से
वोह समझे की शेर ओ शायरी की है..!!!





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