Wednesday, April 22, 2020

चक्रव्यूह

लो बदली फिर तूने काया, मन पर लेकिन बदल न पाया !
मैल चढ़ी थी जो भी कोई, साथ लिये तू फिरता आया।
लो बदली फिर तन ने  काया, मन तो फिर भी बदल न पाया ?

परत-परत चढ़ी मैली चादर, धूली ओढ़े  मन की घागर !
बार-बार फंसा ब्रंम का जाया, रंग-मंच पे  थिरकता आया।
काम क्रोध लोभ जनी माया, मन को यह ही समझ न आया !

"जनम है दुःख" बस कहता आया, खुद का रचा नज़र नहीं आया !
नट भी तू - नाटाधीश भी तू है, हँसता भी तू -रोता  भी तू है।
चक्रव्यूह तू स्वयं रचाया, आ तो गया पर निकल न पाया !

"अभिमन्यु" तेरा कौन सहाया? अधजल गगरी क्यों बन आया?
क्या कर लेगा बदल कर काया? मन यदि तेरा बदल न पाया?
लो बदली फिर तूने काया ! मन को लेकिन बदल न पाया !



हविषा करिहालू
Havvisha Karrihaloo







क्षमा शारदे क्षमा।

क्षमा शारदे क्षमा, क्षमा शारदे क्षमा,
तू रूठी है कुछ तो हुई है खता
जहाँ मैं रहूँ  हो तेरा आसरा,
तेरी मिटटी से पर यूँ ना कर तू जुदा ।
क्षमा शारदे क्षमा।

वो दरीचे से तेरी सहर देखना,
शंकराचार्य का मंदिर है आँखों बसा।
तेरी गोदी की झीलों में घूमना,
चश्मिशायी के पानी में खेलना।

नहीं जानती क्यों मिली ये  सज़ा ,
तू रूठी है कुछ तो हुई है खता।
तुझ पर चली जब गोलियाँ ,
न कुछ कर सकी सब हुआ जब धुआँ।
मैं छोटी थी तब नहीं था पता,
दिल में है आज खंजर गड़ा।
क्षमा शारदे क्षमा,क्षमा शारदे क्षमा।

लौटा तेरा आँचल माँ ,
हम बिखरे पड़े हैं यहाँ -वहाँ ।
तेरी वादी में शैतान है घूम रहा,
आ उसका अंत करने तो आ।
जहाँ मैं रहूँ  हो तेरा आसरा,
तेरी मिटटी से पर यूँ  न कर तू जुदा ।
क्षमा शारदे क्षमा, क्षमा शारदे क्षमा।


Havvisha Karrihaloo