Saturday, February 19, 2011

Chai..

छुट्टी है ...और आँखों में अभी भी नींद है.
ठंडी ठंडी सुबह में हलकी हलकी धुप है..
उबासी लेते हुये आलस की चपेट में 
चाय की मन में उठती तलब है
पानी, दूध, थोड़ी शक्कर जादा ,
घस्सा हुआ अदरक चाहे जितना चाहा...
फिर चुस्क्कियूं से भरा गरम गरम प्याला..
वाह री चाय सुबह का रंग बदल डाला..






Wednesday, February 16, 2011

बस थोड़ी देर और..

एक तूफ़ान रोके बैठी हूँ,
तेज़ उफनती नदी का ,
बांध बन के बैठी हूँ ....
उम्मीद है मेरा रुआं रुआं झेल पायेगा
अब तक सहा है,
कुछ दिन और रुक पायेगा...
पल पल गिनते गिनते
लम्हे बिता रही हूँ...
बस थोड़ी देर और,
यह दिल को समझा रही हूँ...

यह इंतज़ार भी अजीब खेल दिखता है,
दिल को संभालते संभालते ,
क्या कुछ नहीं कर जाता है..
कभी जो हरकत बुरी लगी थी..
उसी पर प्यार आ रहा है,..

साथ बीते हर पल ,
दिल गुनगुना रहा है...
मेहेज़ एक ख़याल सोंच  कर,
 मुस्कुरा रही हूँ,
बस थोड़ी देर और,
यह दिल को समझा रही हूँ...

------------------------------ हविषा :)

Thursday, February 10, 2011

कुछ पूछना था तुमसे यार

आमा मियां , सुनो तो बरखुरदार..
कुछ पूछना है, जानाना है  तुम्हारा विचार..
चरस , गंजा, इन सब से रही अनजान..
लत क्या होती है नहीं था ज्ञान...

पर आज बहुत हिम्मत की है,
दुनिया से एक छुपी बात करनी है...
लत लग चुकी है मुझको यार,
face book का चढ़ गया है मुझे बुखार..

कहाँ तो नज़र न आना सालों तक,
पर रोज़ तुम्हारे update में हैं हम अब....
क्या तुम्हारी भी येही स्तिथि है ??????
इसमें किसकी गलती है...???

सोंच रही थी FB को letter लिखूं ,
या legal notice का करदूं एलान ..????
चार साल पहले शादी की थी,
पर आज लगता है laptop से हुयीथी...!!!

हर एक घंटे में notification का है इंतज़ार ,
रोज़ आज कल कविता करती हूँ atleast चार...
फिर comment की भी आशा रखती हूँ हर बार,
PHEW!
I know this is totally too much यार,
कहा था न FB ka chada hai bukhar...

जानती नहीं क्या है सार,
FB है या तुमसे जुडने का है ख़याल...??
पर लगता FB बहाना है,
तुमसे बस यह कहना है....
its because of you am addicted सरकार
This poem is dedicated to all of you yaar!!!
-------------------------- ;) love havisha/ chuttus/ neetu


Wednesday, February 9, 2011

वोह समझे ....

मैं तो कर रही थी बयां हाले दिल अपना
वोह समझे की खूब शेर ओ शायरी की है..!!!
जब आसूं लफ्ज़ बन उतरे  कलम से
वोह समझे  की मैने कविता की है..!!!!

पूछती है दुनिया मुझसे, ये लफ्ज़ कैसे पिरोती हो तुम?
क्या जवाब दूं... कभी शब्द, यूं टिटोले न हम..
हाँ,... लिख देती हूँ... कभी कभी जो मन का विचार है..
समुंदर को भी भला क्या उसकी लेहेरों का आभास है ?
कब बनती... कब बिगडती..... यह कहाँ उसके हाथ है...
गरजते बदलते मौसम के साथ का प्रभाव है...

शब्द भी कुछ यूं ही मेरे मन का साज़ है,
कब सजे कब बजे, मन का प्रभाव है..
दिल की राय तो सिर्फ गूगा एहसास है ,
महसूस तो करोगे फिर भी लफ्ज़ का मोहताज है..
इस एहसास को सिर्फ शकल ओ सूरत दी है
और वो कहते हैं की मैने कविता की है..

जब आसूं लफ्ज़ बन उतरे कलम से
वोह समझे की शेर ओ शायरी की है..!!!





इन्तिज़ार....

आज रोको न मुझे ,दिल भर जो आया है...
समझाना तो न होगा,न बयां ही होगा हमसे...
सियाही में ही ढाल सकूं ,गनीमत होगी खुद पे..
एक टीस सी उठी थी ,तुझे जाता देख दिल में...
आज उसी टीस ने फिर सर उठाया है ..
आज रोको न मुझे ,दिल भर जो आया है......

यह इन्तिज़ार भी क्या बाला है , दर्द में मिठास सा जग आया है..
की हर जाता लम्हा , तुझे मेरे और करीब ले आया है.....
आंखें नम हैं ज़रूर , पर होंठों पर मुस्कान ने फ़रमाया है ..
बस कुछ पल और, और वो लौटने वाला है....
आज रोको न मुझे , दिल भर जो आया है.....

प्यार है या सज़ा ..... अर्ज़ किया है

"कभी हम दिल से कहते  हैं ,
कभी दिल हम से कहता है.
तव्वजो जिसकी रहती है ,
इन्तिज़ार उसी का होता  है...
जो आसानी से मिल जाये ,
तो फ़साना कहाँ बनता है...
थोड़ी तड़प, थोडा और इन्तिज़ार
तो हमेशा रहता है...
यूँ ही नहीं यारों ,
प्यार का दूसरा नाम सजा होता है...."
--आदाब आरज़ है....... :)