Wednesday, February 16, 2011

बस थोड़ी देर और..

एक तूफ़ान रोके बैठी हूँ,
तेज़ उफनती नदी का ,
बांध बन के बैठी हूँ ....
उम्मीद है मेरा रुआं रुआं झेल पायेगा
अब तक सहा है,
कुछ दिन और रुक पायेगा...
पल पल गिनते गिनते
लम्हे बिता रही हूँ...
बस थोड़ी देर और,
यह दिल को समझा रही हूँ...

यह इंतज़ार भी अजीब खेल दिखता है,
दिल को संभालते संभालते ,
क्या कुछ नहीं कर जाता है..
कभी जो हरकत बुरी लगी थी..
उसी पर प्यार आ रहा है,..

साथ बीते हर पल ,
दिल गुनगुना रहा है...
मेहेज़ एक ख़याल सोंच  कर,
 मुस्कुरा रही हूँ,
बस थोड़ी देर और,
यह दिल को समझा रही हूँ...

------------------------------ हविषा :)

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