Saturday, August 15, 2020

Humko unse unko himse gila sa hai

 हमको उनसे-उनको हमसे गिला सा है....

बात बाकी है मगर,

शिकवा दिल- ए -सजा सा है..

हमको उनसे-उनको हमसे गिला सा है....


बेतकल्लुफ हो करते थे कभी बयाँ जिनसे,

उनसे ही आज,

तकल्लुफ का समॉं सा है... 

हमको उनसे-उनको हमसे गिला सा है....


थमती नहीं थी जिनसे हरसू बातें,

बेलफ़्ज़ और गूंगा,

आज वहॉं वक़्त हुआ है... 

हमको उनसे उनको हमसे गिला सा है....

Friday, August 14, 2020

Desh mere

 देश मरे मैं जहाँ रहूँ,

तेरी मिटटी मेरे संग चले.

तेरी सेवा कर मैं सकूं,

चाहे कोई भी भेष में.


आबाद तू, खुश हाल तू,

सदा रहे तेरी गरिमा,

लाखों आये, षड़यंत्र रचा, 

पर काम न हुयी तेरी महिमा !


यूँ तो है ह्रदय बसा मोक्षार्थी होने का सपना ..

पर तेरी गरिमा वृद्धि का यदि एक अंश भी बन सकूं 

तो स्वीकार है सौ और जनम मुझे लेना..


जय हिन्द !


Friday, July 31, 2020

Fleeting moments

Trying to capture time,
In fleeting moments of glee..
Not even a size of spec are we!
How high and low we still get to feel?
Not even a spec...not even a spec... are we!

My eyes limit me to my scope..
But mind sees beyond this scope..
Letting me free..free... free..
How I always wanted to be.. ⭐

#mommydottydairy just being in the moment
#havvishakarrihaloo
#selfcomposition


Wednesday, July 29, 2020

Chand.

दूर की चमक पर दुनिया रश्क करती है..
चमक में छिपे दागों से अनजान रहती है!
तेरी ज़मीन तू ही जाने,
यह  दाग कौन सी कहानी बयान करते हैं !

बेफ़िक्रे हम, गुस्ताख़ हो चले हैं..
तुम्हारा गम समझाने चले हैं !
जाम की क्या ज़रुरत उन्हें, 
जो तुम्हें देख नशे में पढ़ रहे हैं..

Havvisha karrihaloo

7/29/2020

Monday, July 6, 2020

Waqt ki peshgi-निशब्द

निशब्द

कभी कभी वक़्त ऐसे  पेश आता है,
जैसे उसकी मेरी कोई  पहचान नहीं!
बेतकल्लुफ होके  कुछ भी थमा जाता है;
जैसे उसको मेरा ज्ञान ही नहीं!

हर बार नयी कहानी  लिखती हूँ ,
और बीच  लिखावट किताब खींच  ले जाता है?
 नाराज़गी से मैंने पुछा,"अरे! कहानी पूरी तो होने दे?
सिहाई अभी सुखी नहीं है मेरी, एक कथा तो पूरी करने दे!"

वक़्त बे रुके फ़रमाया,"समय  ख़राब न कर,
 जो दिया है उस पर काम कर।
 कहानी अधूरी थी यह किसने कहा ?
 यहीं तक की  सीख थी तो खींच लिया।"

लिखावट की लम्बाई का गम न कर,
सिहाई बाकि है तो बस लिखती चल...
हर बार तुझे नया पन्ना थमा जाता हूँ,
कई ऐसे  भी है..जिनको  बिना पन्ने  छोड़ आता हूँ।

तू  रच रही है इसका भ्रम न कर
सोने की लंका न छोड़ी,न बक्शी कृष्ण की द्वारिका...
यह मेरा रचा चक्रव्यूह ,तू सिर्फ उसकी नायिका...

हर बार इस तरह क्यों स्तब्ध कर जाता है?
बेतकल्लुफ होके  कुछ भी थमा जाता है !

#mommydottydairy penning life

havvishakarrihaloo

Friday, May 15, 2020

Decided to let go

I decided to let go..

The wish that seemed(now) impossible..
I decided to let go..

The time that's now a passe
I decided to let go..

Reassessing, reassuring, reshuffling those dreams ...
Rolling new dice on life's new screen..

New bar is set,much different from the rest..
this is new...
Mind driven with heart now at rest..

I wondered, is this defeat, restaring,  with time no longer by my seat?

Silence is what I heard  though rain roared pouring gallore..

I turned within to search what I felt...
peace and Quite.. is all I could sense...

Calmness engulfed the then stormy sea..
Its victory I realized , not defeat!


Letting go ..and with it dissapeared fear n anxiety untold... I held no more

With it long storm had finally set.. shipwreck pieces no longer matter...

but I survived and so did those who I held close to me..

Is it really defeat i thought, or another chance to do it right..this time things who knows might just turn around..

And it might be what i always wanted and could be more.. than what I could imagine








I realized. .. how much I gained..

I wonder if this was defeat as I reshuffle for a new deal... no idea what will unfold..
This gamble has been a challenge


Wednesday, April 22, 2020

चक्रव्यूह

लो बदली फिर तूने काया, मन पर लेकिन बदल न पाया !
मैल चढ़ी थी जो भी कोई, साथ लिये तू फिरता आया।
लो बदली फिर तन ने  काया, मन तो फिर भी बदल न पाया ?

परत-परत चढ़ी मैली चादर, धूली ओढ़े  मन की घागर !
बार-बार फंसा ब्रंम का जाया, रंग-मंच पे  थिरकता आया।
काम क्रोध लोभ जनी माया, मन को यह ही समझ न आया !

"जनम है दुःख" बस कहता आया, खुद का रचा नज़र नहीं आया !
नट भी तू - नाटाधीश भी तू है, हँसता भी तू -रोता  भी तू है।
चक्रव्यूह तू स्वयं रचाया, आ तो गया पर निकल न पाया !

"अभिमन्यु" तेरा कौन सहाया? अधजल गगरी क्यों बन आया?
क्या कर लेगा बदल कर काया? मन यदि तेरा बदल न पाया?
लो बदली फिर तूने काया ! मन को लेकिन बदल न पाया !



हविषा करिहालू
Havvisha Karrihaloo







क्षमा शारदे क्षमा।

क्षमा शारदे क्षमा, क्षमा शारदे क्षमा,
तू रूठी है कुछ तो हुई है खता
जहाँ मैं रहूँ  हो तेरा आसरा,
तेरी मिटटी से पर यूँ ना कर तू जुदा ।
क्षमा शारदे क्षमा।

वो दरीचे से तेरी सहर देखना,
शंकराचार्य का मंदिर है आँखों बसा।
तेरी गोदी की झीलों में घूमना,
चश्मिशायी के पानी में खेलना।

नहीं जानती क्यों मिली ये  सज़ा ,
तू रूठी है कुछ तो हुई है खता।
तुझ पर चली जब गोलियाँ ,
न कुछ कर सकी सब हुआ जब धुआँ।
मैं छोटी थी तब नहीं था पता,
दिल में है आज खंजर गड़ा।
क्षमा शारदे क्षमा,क्षमा शारदे क्षमा।

लौटा तेरा आँचल माँ ,
हम बिखरे पड़े हैं यहाँ -वहाँ ।
तेरी वादी में शैतान है घूम रहा,
आ उसका अंत करने तो आ।
जहाँ मैं रहूँ  हो तेरा आसरा,
तेरी मिटटी से पर यूँ  न कर तू जुदा ।
क्षमा शारदे क्षमा, क्षमा शारदे क्षमा।


Havvisha Karrihaloo




Monday, March 9, 2020

मैया मैं न खेलूँ होली !

१) "रंगों का त्यौहार है होली, हँसने का व्यव्हार है होली।
 नए नए भेष में, अलग अलग परिवेष में ;
सतरंगी रंगों में रंगी , काली, नीली, पीली टोली।
मिठास भरती  हर एक की बोली ,वह गुजिया, लड्डू , बर्फी मनमोही।
मन भर खाना, होली है होली "  -- ऐसा बोली मैया मोरी।

२) फिर भी मन कहीं मान न पाया," डर लगता है , माँ " , मैंने बतलाया.;
"जैसे भूत भैरव की टोली, काले , नीले , पीले, अघोरी।
ना ना मैया, मैं ना खेलूं होली, मेरी मिठाई सम्भाल रख दीजो ,
मैं तो ना निकलूं , आवाज़ भी ना दीजो"

३) अश्रुपूर्ण होकर मैं बोली- "जाने कैसा त्यौहार यह होली,
बिन मौसम बरसात है होली, क्यों बता खेलूं मैं होली?
ना मुझे नहीं खेलनी होली. "

मुस्कुराती माँ ने सहलाया,गोद लिया, बाँहों में समाया, बोली-
" बाहर निकल , चल छोड़ होली, आ तुझे सुनाऊँ कहानी मनमोहि "

"कहानी! कहानी मुझे अति प्रिय है , माँ के शब्दों में और मधुर है"

४) " बड़ी पुरानी बात है ", बोली
"एक राजा था - बड़ा हठैली, तप था साधा -बना घमंड़ी।
बाहुबल के सर्वत्र थे चर्चे, इन्द्र देव सब हारे थे उससे।
खुद को वह ईश्वर कहलाता , हिरण्यकश्यप था नाम बताता।

५) उसकी थी एक मायावी बहना ,
जो तप कर बह्रमा को प्रसन्न करी  थी।
वर में प्राप्त किया था कम्बल,अगनी पर जिसने विजय धरी थी।
अहंकारी, घमंडी वह भी ,खुदको होलिका कहती थी
"ओह! कैसा कम्बल मैया ?" -
होली का भय मैं भूल चुकी थी, मायावी कम्बल में डूब चुकी थी।
" फिर क्या हुआ बोल ना मैया " -कम्बल में मेरी रूचि बड़ी थी।

६) ऐसी वैसी चादर ना थी , बड़े अलग थे उसके रेशे।
सुनहरे रंग की रेशम सी  कम्बल, चंदा जैसी ठंडक देती
उसपर यह वरदान अनूठा -
"ओढ़े यदि इसे होलिका , अगनी  उसे छू ना सकेगी। "

७) होलिका का था एक भतीजा।
हिरण्यकश्यप का इक  लौता बेटा।
नाम प्रहलाद  रखे थे नारद, दीक्षा जिसे गर्भ में मिली थी।
प्रहलद हुआ  सभ्य सुशील , करुणा धैर्य उसमें असीम।
था तो वह हिरण्य का बेटा , उस जैसा  ही बड़ा हठी था।
नारायण का भक्त बड़ा था, अपने ही पिता के विरुद्ध खड़ा था।

८) " क्यों नहीं मानता - मैं सर्वेश्वर, देता क्यों मृत्यु तू निमंत्रण?
  तेरी जीवन डोर का परचम,यूँ मसल दूँ चाहूँ मैं गर। "
राज्य सभा में गरजी यह वाणी, सतब्ध हुए सब सुन यह प्राणी।
भय का वातावरण बंधा था, पांच साल का प्रहलाद निर्भय खड़ा था।
होलिका को फिर दिया आदेश, भस्म का प्रहलाद का खेल।

"यह क्या मैया?  यह कैसी कहानी?  धर्म को मृत्यु शैया और अधर्म की मनमानी?
होलिका के पास तो चादर है! बोल मैया यह कैसी कहानी?"

९) एक भव्य चिता सजाई गयी , चन्दन की लकड़ी लाई गयी।
हर चीज़ जो जल सके, उस चीज़ से चिता सजाई गयी।
अंदर आने का था रास्ता , बहार जाने का कोई मार्ग नहीं।
जिसने भी देखा वह काँपा  , प्रहलाद की मृत्यु अटल भयी।

१०) आयी होलिका प्रसन्न चित, उसका बल देखेगा जगत।
ओढ़ी उसने स्वर्णिम चादर, चढ़ी चिता पर ठहाके भर कर।
" आओ मेरे भ्राता के शत्रु, एक आखरी बार गोद  में धर लू."
फाटक हुए बंद चहुँ और, एक टक देखते सभ भाव विभोर।

११) "जैसे अगनी की लपट बढ़ी, हवा से चादर अकस्मात् उडी!
दर्शक कोई समझ ना पाया - मायावी चादर प्रहलाद पर कैसे'चढ़ी ?
चीख, कलहः होलिका का गूंजा, नीति की अनीति पर विजय भायी "
और इस तरह मेरी गुड़िया,  होली के दिन थी होलिका जली."

"ओह ! तो इस लिये हर रंग से तूने मैया थाली भरी?
अनूठी कहानी बोली , मैं भी अब खेलूंगी होली !
अधर्म पर धर्म की विजय पताका के सवर्णिम दिन की है यह घडी !
होली है , होली है मैया --यह सारी  गुजिया मेरी हुई "

Happy Holi 2020
#mommydottydiary
3/7/2020