Tuesday, October 26, 2021

जाने कौन?

जाने कौन यह मेरा बोझ ढ़ो रहा है?
दुनियां को दिखती मैं हूँ, पर कहानी कोई ओर रच रहा है !

जब भी कोई राह ख़त्म हुयी, 
एक नया रस्ता हरसू खुला है !
जाने क्यूँ हर बार आखिरी साँस तक रुकता है?
वक़्त से पहले लेकिन कब कुछ मिला है?
मानो मेरी परिक्षा ले रहा है?

भविष्य देख जब भी घबराई हूं, 
तब " कार्य-रथ रह" संदेश भेज रहा है!
जाने कौन यह मेरा बोझ ढ़ो रहा है?

कंधे मेरे धंसे दिखते हैं ,
पर दर्द लेश मात्र नहीं हो रहा है!
जाने किसका हाथ बोझ और कंधों के बीच धंसा है?

आंखें नम हैं, बंद हैं फ़िर भी सब दिख रहा है !
शरीर थका है पर फ़िर भी चल रहा है,
जाने कौन मुझे गती दे रहा है?
दुनियां को दिखती मैं हूँ, 
पर यह किरदार कोई ओर रच रहा है!

मन का मंथन करती मैं एक रत्न उभरा है, 
भय के हलाहल के बाद, विश्वास अमृत मिला है !

तेरा शुक्रिया प्रभु,तूने मुझे बहुत कुछ दिया है!

#selfcomposition
#mommydottydairy feeling 
#Grateful  #thankful #blessed

🙏❤🙏




















Sunday, August 8, 2021

Its not the destination, Its the Journey!

 Oh! how I long to be home..

My final destination, some more pending milestones!

Fulfilling what is needed, as fast as I can.

Using given tools to see what else is there to find!

Some may understand, rest may think I am crazy!

I smile, as I am , Neti, neti, neti....


Every time I push my limits,  the door self disappears

Thus comes a new level a new treasure appears!

Who knows what else is there to find.

Even though I see it , its hard to define. 


Just like a child in a toy store shines,

I run around with a 'treasure mine'. 

So much I say yet not a word you may hear..

So much I travel yet you'll find me still and near


Oh how fascinating I feel this to be!

Its certainly not the destination, its all about the journey! 

Oh! how I  long to be home, 

I would have explored so much then which today is unknown!

#mommydottydairy

#selfcomposition

Havvisha Karrihaloo

8/8/2021 




Wednesday, June 30, 2021

हे परमेश्वर!

"हे परमेश्वर ! 

सुनते हैं क्या ? मन में उठी छोटी सी इच्छा, 

सोंचती हूँ कहूँ भी या ना ?"

शिवजी हुए भोंचक्के से, थोड़े छिपे अचम्बे से.. 

नेत्र मूंदे , मुस्काकर बोले, 

" प्राणप्रिये यह क्या ? तुम में - मुझ में कैसी झिझकता ?

इस अनुमति में कहीं  छिपी तो नहीं परीक्षा ?" 

" अरे नहीं !" , बोली माँ हँस के ,"मैं क्यों लूँ भला कोई परीक्षा ?"

" वो, वृन्दावन में कल रास रचा था, क्या सुना संवाद  राधा कृष्ण का ? 

राधा तो एक न बोली , और कृष्ण ने सारा समां रंगा था।  

उसके नयन , हृदय , मुखमण्डल का विवरण लीलाधर ने अतुल्य किया था" 

ठिठोली करते बोले गंगाधर,

"अरे वह तो ठहरा लीलाध, लीला करना कब न प्रिया  था ?

पर सच कहती हो प्रिये , शब्दों का मनो जाल बुना था, 

वह कहता, तो मैं भी गोपी बनने  तैयार खड़ा था !" 

माता की अखियाँ चुंदियाँई, बोलीं -

" हे नाथ ! आपको वह सब समझा था, अचंबित हूँ, अच्छा भी  लगा था !

प्रभु, मेरे मन की भी है इच्छा, मैं भी सुँनू प्रेम प्रियतम का,

बस यही छोटी सी अनुकम्पा, दो पंँक्ति कर दो विवरण अपनी प्रिया  का?"

आँख खुली, ध्यान को तोडा, नील कण्ठ ने आसन छोड़ा !

यह, यदा - कदा पार्वती को क्या सूझा ?

बोले ,"प्रेम विवरण और व्याख्या, मैं तो ठहरा  साधू भोला !

पर गर ,यही है तुम्हारी इच्छा- तो, याद है वध महिषासुर का ?

शुम्भ निशुम्भ को भी नहीं था छोड़ा! रक्त बीज को तो वह ! क्या कर तोडा!

"बस ! " टोकि फिर माता ,

 "बस - बहुत सुनली व्याख्या, क्षमा करें जो की प्रार्थना, 

ध्यान आसान है करे प्रतीक्षा , यह सब आपके नहीं बस का। "

अधरों से हँसी लुप्त हुयी थी , नयनों में अश्रु की परत चढ़ी थी ,

देख माँ का  मुरझाया चेहरा , शिव शंकर को यह बात चुभी थी।  

प्रेम ह्रदय अपार भरा था , पर शब्दों में विवरण कहाँ सुलभ था ?

पिघला ह्रदय शिव शंकर का फिर बोले,

" प्राण प्रिये सुनो , तनिक ठहरो , हम तो ठहरे भोले !"

 "रुष्ट ना होना मुझसे प्रिये तुम , मेरी बात कहाँ पूर्ण हुयी थी ?

कर सके तुम्हारी छवी का विवरण , प्रिये शब्दों में कहाँ इतना दम ?

तुम न रुकी तो किसे सुनाऊँ मेरी आत्मा का आलिंगन ?"

"सागर से गहरे तेरे नयन , मनो समेटे धरती और गगन, 

माथे पर चमके बिंदी और टीका, कैलाश सवर्ण रूप इसी का नतीजा। 

कानों में सुशोभित सुन्दर कुण्डल , रचते गृहों का  दिक्षा परिक्रम, 

हाथों सजे तुम्हारे कंगन , संचालित करें गुरुत्वाकर्षण। "

"होंठों सजी मंद मुस्कान तुम्हारी, पल में करती ब्रमांण्ड  सृजन ,

तुम्हारी पायल की ध्वनि सुन , कौतुल करता स्वयंँ  जीवन। 

हर लेता मेरा भी यह मन, योगी से गृहस्त परिवर्तन ,

जो स्तोत्र तुम स्वयंँ अपार प्रेम का , उसका कैसे बाँधूँ  विवरण ?"

"तुम्हारे सुन्दर रूप की आभा , पूर्णमाषी  के चाँद का दर्पण। 

नव दुर्गा रूप प्रसिद्ध तुम , क्रोध में भी अतुल्य, अद्वित्य तुम , 

शिव नहीं शिव , वह शव शक्ति बिन ,

प्रिये केवल तुम ही मेरा मन।  "

सुनकर प्राण परमेश्वर से विवरण , माँ का आनंदित हुआ मन। 

प्रफुल्लित  चित, शरमाये फिर नयन, ह्रदय ने ओढ़ा प्रेम आवरण। 

                    रसभोर शिव के शब्दों से , गद -गद हुआ  परमेश्वरि का मन। 

था वह कैसा क्षण बतलाऊँ ?  स्पष्ट हुआ दोनों का मिलन ,

अर्धनरेश्वर का दर्शन, स्वतः हुआ नमन यह मन। 

 सम्मलित बोलो श्रोता गण , "जय शिव शंकर तुम्हें नमन"!

------- हविषा कारिहालू