Saturday, December 16, 2017

साधू , रमता....

साधू , रमता। रमता, जोगी।
रमती, कल कल नदिया...
रम जाऊँ, मैं भी अब रंग में ,
तरसे मन का खेवैया।
उथल-पुथल के बीच टहलती,
खुद की रची परिभाषा। ...
ढूंढने निकली थी उस को ,
प्रतिबिम्ब में खुद को पाया।
जीवन की इस दौड़ में,
क्या किया और क्या करवाया ?
यथार्थ जानने निकली थी,
सिमटी मिली शून्य में माया।
Havvisha kaarihaloo