Saturday, November 30, 2019

Search within

Renunciation & attachment,
 both lie within...
What you choose,eventually wins..

Key is to strike a balance.
Attach  while at it,Renounce when done!
Thus plays the cycle, the role-play thus runs.

Up and down,I watch maya run..
Assigning thy role, Directing thy run...

I watch this drama from outside
Even though I stand within..
Liberation is what I feel
Untouched by schedule it governs.

Hear thee..and hear me loud
Thy are complete
Dont go looking around..

As I shout and yell this truth
Am well aware only few
posses the decibles..
No not because they cant,
It's because we are focused wrong..

I repeat and will say it again..
Renunciation & attachment,
 both lie within...
What you choose,
eventually wins..

Sunday, November 17, 2019


समर्थ ही पुण्य , दुर्बलता ही पाप। 

किसी भी स्थिथि में दुर्बल जो कष्ट भोगना पड़ता है ,कितना भी ऊपरी ताल मेल अथवा हेर फेर उसे बचा नहीं सकती।  दुर्बल रहना संसार का सबसे जगन्य पाप  है. क्यूंकि इस से स्वयं हमारा विनाश होगा और  दूसरों की हिंसा प्रवृति को प्रोत्साहन मिलेगा। 

हमारे पूर्वजों ने कहा है की अपने शरीर की विनाश से रक्षा करना सर्वोच्च धर्म का एक अंग है। शारीरिक संगरक्षण का एक मात्र आधार शक्ति है।  विश्वामित्र के बारे में बताया जाता है की एक बार बड़े आकाल के समय उन्हें कई दिनों तक भोजन नहीं मिला।  एक दिन उन्होंने एक चांडाल के घर में एक मर्त कुत्ते की सड़ती हुयी टाँग  पड़ी देखी।  विश्वामित्र ने झपट कर उसे ले लिया और परमात्मा को भोग लगा कर उसे खाने को सिद्ध हुये। चांडाल विस्मय से बोलै "तुम कुत्ते की टाँग कैसे खा रहे हो ?"  विश्वामित्र ने उत्तर दिया, " संसार में तपस्या और सत्कर्म करे के लिये मुझे पहले जीवित रहना हो और शकितशाली होना आवश्यक है." 

 परन्तु पिछले कुछ दशकों में हमारे देश में जो विचार रहा है उसमें शक्ति को पापपूर्ण और गर्हित माना जाता रहा है। अहिंसा के गलत अर्थ लगाने के कारण राष्ट्र के मस्तिष्क की विवेचन शक्ति समाप्त हो  गयी है।  हमलोग शक्ति को हिंसा मानने लगे हैं तथा अपनी दुर्बलता को गौरववात्सव समझने लगे हैं। 

जो हिंसा करने में पर्याप्त समर्थ है परन्तु जो संयम , विवेक और दया के कारन ऐसा नहीं करता केवल उसी व्यक्ति के लिये यह कहा जा सकता है की वह अहिंसा का आचरण करता है, और कोई दुसरे के लिये नहीं।  

"ह्रदय में हो प्रेम लेकिन, शक्ति भी कर में प्रबल हो , 
यह सफलता मंत्र है,करना इसी की साधना"

Wednesday, October 30, 2019

जाने क्या है तुम में ?

जाने क्या है तुम में , जो मैं पिघल जाती हूँ ?
तुम्हारी चाह पूरा करने में जुट जाती हूँ !

खाना बनाना तो आता नहीं , पर तुम्हारे Critic झेल जाती हूँ !
ऐसा क्यों है कि तुम्हारी पसंद का हो ,इसी में जुट जाती हूँ ?

कुछ ज़ादा जो की आना कानी , दो हाथ भी लगा जाती हूँ।
फिर देर रात तक सिर्फ करवट बदलती रह जाती हूँ !
ऐसा  क्यों  है कि बाद में सौ नहीं पाती हूँ ?
जाने क्या है तुम में , जो मैं पिघल जाती हूँ ?

Mumma यह , Mumma वोह , मेरे कान खा जाती हो !
एक बार में सुन लो, ऐसा ख्वाब में भी नहीं कर पाती हो ?
फिर भी सौ बार दोहराती मैं पीछे पीछे भागी आती हूँ !
ऐसा क्या है तुम में , जो मैं पिघल जाती हूँ ?

थकी हारी शाम को तुमको जब लेने आती हूँ
अपनी आवाज़ से थकावट को जीत में बदल जाती हो !
तुम्हारा दिन कैसा बीता सुंनने में लग जाती हूँ !
ऐसा क्या है तुम में जो मैं सब भूल जाती हूँ !

Liza ने ऐसा किया और  Jordan ने वैसा,
मैं सबसे सच्ची हूँ, बाकी ऐसे का तैसा !
चुप चाप सुनती  रोज़ मैं तेरी सारी कहानियाँ ,
ऐसा क्या है तुम में की बस  मुस्कुराती रह जाती हूँ।

"क्या Magic सच है Mumma ?" ,
अजीब गरीब सवाल दोहराती हो !
हाँ Magic सच है मेरी माँ,
इसलिये तो जवाब न होते हुए भी
मैं हर बार पिघल जाती हूँ !

यह जो भी है तुझमें , वह हर रोज़ जीना चाहती हूँ
तेरी एक मुस्कराहट के लिये नौटंकी बन जाती हूँ!
यह MAgic ही तो है  जो  मैं पिघल जाती हूँ..
तुझको हर ख़ुशी दे सकूं इसी में लग जाती हूँ

जाने क्या है तुम में , जो मैं पिघल जाती हूँ ?






Friday, October 11, 2019

ना होता वोह तो..


अर्ज़ किया है---

ना होता वोह तो भी आज होता, मगर ऐसा ना होता..
ज़िन्दगी के जज़्बातों में  शायद एक पन्ना उधार  होता।

किसी का होना, ना होना, बेशक अपने हाथ नहीं ,
मगर ज़िन्दगी कोई बेतुका इतिफाक नहीं।

हर पन्ने पर एक सीख दर्ज होती है ,
कभी ख़ुशी के नाम, कभी गम की शाम होती है।

वोह ना होता तो कोई और होता ...
मगर  जो होना है वह  तो  होके  रहता।

वोह नहीं डूबाता, तो तुम खुद डूब जाते
जब तैर कर जीतना है नसीब ,
तो डूबने के सौ और ज़रिये सामने आते।

क्या हुआ क्यों हुआ ,यह गम ना कर..
क्या सीखा, क्या बटोरा, मुसाफिर इल्म कर।

देख तेरी गठरी एक बार फिर टटोल  कर ,
हर रंग के काँचे ,ले चला तू बटोर कर..

दोस्त, वोह होता, तो भी आज होता,
पर ज़िन्दगी की सीख में एक पन्ना ज़रूर उधार होता। 

-----हविषा




I KID YOU NOT

Of all the prized possessions I keep,
Freedom is the closest to me...
Expression in action and not just in thoughts..
Boy did I bruise? You bet! I lost count..

I played what felt like was best,
With cards I was dealt with...
Felt like a rookie in every new game
Retrospect...a lot could've changed
While in the moment..things are never sane..

Hear me now.. and hear me clear...

When you see regret showing its face
Dust off your pants and pull back your mane.
That's the best you could've done
Given the uncertainty of this game.

You played well...I KID YOU NOT!
Regret makes you live in past,
Focus on NOW that is all you got..
Curtains are drawn on role play of past

Your current role is all you got!
Don't sweat the bruises
only a player gets them all.
Be rather a player
than a by stander in stall.

Your game has improved
you better not stop..
You shall play very well..
I KID YOU NOT..!!!

Friday, September 20, 2019

अपने पंखों में जो भर ली उड़ान है

उड़ते पन्नों की खुली सी यह किताब है,
कुछ कहा, कुछ सुना, फिर लिखा एक ख्वाब है...

दायरों में भंधना कहाँ मेरा मुक़ाम है ,
गीले पंखों के सूखने का इंतज़ार है..

उड़ान भरने को मेरे ख्वाब  तैयार हैं,
बेधड़क सा एहसास दिल पे सवार है...

न जीत का लालच , न हार का ख़याल है,
एक बेखोफ सी कोशिश करने को बेक़रार है। ..

एक नयी कहानी नए पन्ने  पर उभरने को तैयार है,
दिन है या रात इसका किसको एहसास है...

कुछ कहा, कुछ सुना , अब पूरा हुआ यह ख्वाब है..
अपने  पंखों में जो भर ली उड़ान है....



sep 19 2019














Thursday, August 29, 2019

बहुत दौड़ाया ज़िन्दगी ने हरे पत्तों के पीछे
आधी उम्र निकाल  दी इसको संजोड़ते

पर जब मौत सामने करीब से दिखी..
एक पन्ना भी न याद आया  मुझे,,
हैरान स्तब्ध सी देखती रही..
निशब्द हो. पत्थर सी  खड़ी रही
न कोई विचार था न पैसे की खनक दिखी..

एक शून्य था जिसको निहारती रही
किसीने  चीख दी.. की हविषा  चलो.. .
उस विचलित आवाज़ को आज़ भी सुन सकती हूँ
कितनी छोटी हो सकती है ज़िन्दगी यह सोचती हूँ..

आस पास  का मंज़ार खौफ से था भरा
हर  आँख  में डर  और होंठो पर खुदा था ..

 फिर लगा कितनी  खली है ज़िन्दगी
अगर जो अपना है  वह साथ न हो  तभी
सारा काम धराशाही हो गया
अपनों का ख़याल दिल रौंदता चल गया
कितनी निसाहय और नाज़ुक है ज़िन्दगी बता गया

एक ही दुआ निकली
हे प्रभु  मेरे अपनों के लिया तूने बच्चा लिया
गर मैं न हूँ तो क्या कर सके  कोई
पर जब तक हूँ  तब तक सहायक तो बन सकूं..

अविलम्ब आसूं बहते रहे..
निशब्द हारी सी मैं देखती रही..
खुद का प्रतिबिम्ब खुद ही न देख सकी

निराश थी की यह क्या कर गयी..
क्यों अमूल्य के पीछे दौड़ती रही
इस एक और मौके  को प्रभु कहीं गवा न दूँ
जो अपने है उनको ख़ुशी दे सकूं

तथाअस्तु !






Wednesday, July 31, 2019

"जो होगा अच्छा ही होगा"

ना पूछो मुझसे सही-गलत,
यह भेद है धुंधला, नहीं सहज।

न पूछो पुनरावृत - "अब क्या होगा?"
मुझे  ज्ञात नहीं भविष्य का लेखा।

कर्तव्य निष्ट, मैं  कर्म भद्द,
जो होगा अच्छा ही होगा।

निष्ठुर नियति की झोली से,
निष्चित ही भाग्योदय होगा।

यह चक्रवात केवल क्षणभर,
तुम वीर अधीर किंचित ना होना।

भयहीन ह्रदय की तीव्र चेतना,
से तय है नव अंकुर प्रफुल्लित होना।  

यह परिक्षा विश्वास की केवल,
अडिग, अचल, विनम्र बस रहना।

क्या होगा यह भय ना कर ,
जो होगा अच्छा ही होगा।


हवविषा काररिहलू


























Friday, July 12, 2019

आत्मसमर्पण

क्या सोंचू ,क्या है अब बाकी,
शुष्क भूमी वर्षा अभिलाषी।
आशा का अंकुर ह्रदय संजोये ,
प्रतीक्षा कर रही मेघ कब रोए।

हर संभव प्रयास कर जोए
प्रतीक्षा ही बस रहे अब जो है,
ऐसे क्षण में आत्मसमर्पण ,
आत्मसमर्पण, आत्मसमर्पण।

जब तक है सांसों का संग्रह,
दर्शक बन  कर आत्मसमर्पण।
द्रिड, स्थिर, अचल,अडिग, अविचल  मन..  
आत्मसमर्पण आत्मसमर्पण।