Thursday, August 29, 2019

बहुत दौड़ाया ज़िन्दगी ने हरे पत्तों के पीछे
आधी उम्र निकाल  दी इसको संजोड़ते

पर जब मौत सामने करीब से दिखी..
एक पन्ना भी न याद आया  मुझे,,
हैरान स्तब्ध सी देखती रही..
निशब्द हो. पत्थर सी  खड़ी रही
न कोई विचार था न पैसे की खनक दिखी..

एक शून्य था जिसको निहारती रही
किसीने  चीख दी.. की हविषा  चलो.. .
उस विचलित आवाज़ को आज़ भी सुन सकती हूँ
कितनी छोटी हो सकती है ज़िन्दगी यह सोचती हूँ..

आस पास  का मंज़ार खौफ से था भरा
हर  आँख  में डर  और होंठो पर खुदा था ..

 फिर लगा कितनी  खली है ज़िन्दगी
अगर जो अपना है  वह साथ न हो  तभी
सारा काम धराशाही हो गया
अपनों का ख़याल दिल रौंदता चल गया
कितनी निसाहय और नाज़ुक है ज़िन्दगी बता गया

एक ही दुआ निकली
हे प्रभु  मेरे अपनों के लिया तूने बच्चा लिया
गर मैं न हूँ तो क्या कर सके  कोई
पर जब तक हूँ  तब तक सहायक तो बन सकूं..

अविलम्ब आसूं बहते रहे..
निशब्द हारी सी मैं देखती रही..
खुद का प्रतिबिम्ब खुद ही न देख सकी

निराश थी की यह क्या कर गयी..
क्यों अमूल्य के पीछे दौड़ती रही
इस एक और मौके  को प्रभु कहीं गवा न दूँ
जो अपने है उनको ख़ुशी दे सकूं

तथाअस्तु !






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