Monday, March 9, 2020

मैया मैं न खेलूँ होली !

१) "रंगों का त्यौहार है होली, हँसने का व्यव्हार है होली।
 नए नए भेष में, अलग अलग परिवेष में ;
सतरंगी रंगों में रंगी , काली, नीली, पीली टोली।
मिठास भरती  हर एक की बोली ,वह गुजिया, लड्डू , बर्फी मनमोही।
मन भर खाना, होली है होली "  -- ऐसा बोली मैया मोरी।

२) फिर भी मन कहीं मान न पाया," डर लगता है , माँ " , मैंने बतलाया.;
"जैसे भूत भैरव की टोली, काले , नीले , पीले, अघोरी।
ना ना मैया, मैं ना खेलूं होली, मेरी मिठाई सम्भाल रख दीजो ,
मैं तो ना निकलूं , आवाज़ भी ना दीजो"

३) अश्रुपूर्ण होकर मैं बोली- "जाने कैसा त्यौहार यह होली,
बिन मौसम बरसात है होली, क्यों बता खेलूं मैं होली?
ना मुझे नहीं खेलनी होली. "

मुस्कुराती माँ ने सहलाया,गोद लिया, बाँहों में समाया, बोली-
" बाहर निकल , चल छोड़ होली, आ तुझे सुनाऊँ कहानी मनमोहि "

"कहानी! कहानी मुझे अति प्रिय है , माँ के शब्दों में और मधुर है"

४) " बड़ी पुरानी बात है ", बोली
"एक राजा था - बड़ा हठैली, तप था साधा -बना घमंड़ी।
बाहुबल के सर्वत्र थे चर्चे, इन्द्र देव सब हारे थे उससे।
खुद को वह ईश्वर कहलाता , हिरण्यकश्यप था नाम बताता।

५) उसकी थी एक मायावी बहना ,
जो तप कर बह्रमा को प्रसन्न करी  थी।
वर में प्राप्त किया था कम्बल,अगनी पर जिसने विजय धरी थी।
अहंकारी, घमंडी वह भी ,खुदको होलिका कहती थी
"ओह! कैसा कम्बल मैया ?" -
होली का भय मैं भूल चुकी थी, मायावी कम्बल में डूब चुकी थी।
" फिर क्या हुआ बोल ना मैया " -कम्बल में मेरी रूचि बड़ी थी।

६) ऐसी वैसी चादर ना थी , बड़े अलग थे उसके रेशे।
सुनहरे रंग की रेशम सी  कम्बल, चंदा जैसी ठंडक देती
उसपर यह वरदान अनूठा -
"ओढ़े यदि इसे होलिका , अगनी  उसे छू ना सकेगी। "

७) होलिका का था एक भतीजा।
हिरण्यकश्यप का इक  लौता बेटा।
नाम प्रहलाद  रखे थे नारद, दीक्षा जिसे गर्भ में मिली थी।
प्रहलद हुआ  सभ्य सुशील , करुणा धैर्य उसमें असीम।
था तो वह हिरण्य का बेटा , उस जैसा  ही बड़ा हठी था।
नारायण का भक्त बड़ा था, अपने ही पिता के विरुद्ध खड़ा था।

८) " क्यों नहीं मानता - मैं सर्वेश्वर, देता क्यों मृत्यु तू निमंत्रण?
  तेरी जीवन डोर का परचम,यूँ मसल दूँ चाहूँ मैं गर। "
राज्य सभा में गरजी यह वाणी, सतब्ध हुए सब सुन यह प्राणी।
भय का वातावरण बंधा था, पांच साल का प्रहलाद निर्भय खड़ा था।
होलिका को फिर दिया आदेश, भस्म का प्रहलाद का खेल।

"यह क्या मैया?  यह कैसी कहानी?  धर्म को मृत्यु शैया और अधर्म की मनमानी?
होलिका के पास तो चादर है! बोल मैया यह कैसी कहानी?"

९) एक भव्य चिता सजाई गयी , चन्दन की लकड़ी लाई गयी।
हर चीज़ जो जल सके, उस चीज़ से चिता सजाई गयी।
अंदर आने का था रास्ता , बहार जाने का कोई मार्ग नहीं।
जिसने भी देखा वह काँपा  , प्रहलाद की मृत्यु अटल भयी।

१०) आयी होलिका प्रसन्न चित, उसका बल देखेगा जगत।
ओढ़ी उसने स्वर्णिम चादर, चढ़ी चिता पर ठहाके भर कर।
" आओ मेरे भ्राता के शत्रु, एक आखरी बार गोद  में धर लू."
फाटक हुए बंद चहुँ और, एक टक देखते सभ भाव विभोर।

११) "जैसे अगनी की लपट बढ़ी, हवा से चादर अकस्मात् उडी!
दर्शक कोई समझ ना पाया - मायावी चादर प्रहलाद पर कैसे'चढ़ी ?
चीख, कलहः होलिका का गूंजा, नीति की अनीति पर विजय भायी "
और इस तरह मेरी गुड़िया,  होली के दिन थी होलिका जली."

"ओह ! तो इस लिये हर रंग से तूने मैया थाली भरी?
अनूठी कहानी बोली , मैं भी अब खेलूंगी होली !
अधर्म पर धर्म की विजय पताका के सवर्णिम दिन की है यह घडी !
होली है , होली है मैया --यह सारी  गुजिया मेरी हुई "

Happy Holi 2020
#mommydottydiary
3/7/2020