अर्ज़ किया है---
ना होता वोह तो भी आज होता, मगर ऐसा ना होता..
ज़िन्दगी के जज़्बातों में शायद एक पन्ना उधार होता।
किसी का होना, ना होना, बेशक अपने हाथ नहीं ,
मगर ज़िन्दगी कोई बेतुका इतिफाक नहीं।
हर पन्ने पर एक सीख दर्ज होती है ,
कभी ख़ुशी के नाम, कभी गम की शाम होती है।
वोह ना होता तो कोई और होता ...
मगर जो होना है वह तो होके रहता।
वोह नहीं डूबाता, तो तुम खुद डूब जाते
जब तैर कर जीतना है नसीब ,
तो डूबने के सौ और ज़रिये सामने आते।
क्या हुआ क्यों हुआ ,यह गम ना कर..
क्या सीखा, क्या बटोरा, मुसाफिर इल्म कर।
देख तेरी गठरी एक बार फिर टटोल कर ,
हर रंग के काँचे ,ले चला तू बटोर कर..
दोस्त, वोह होता, तो भी आज होता,
पर ज़िन्दगी की सीख में एक पन्ना ज़रूर उधार होता।
-----हविषा
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