Sunday, November 17, 2019


समर्थ ही पुण्य , दुर्बलता ही पाप। 

किसी भी स्थिथि में दुर्बल जो कष्ट भोगना पड़ता है ,कितना भी ऊपरी ताल मेल अथवा हेर फेर उसे बचा नहीं सकती।  दुर्बल रहना संसार का सबसे जगन्य पाप  है. क्यूंकि इस से स्वयं हमारा विनाश होगा और  दूसरों की हिंसा प्रवृति को प्रोत्साहन मिलेगा। 

हमारे पूर्वजों ने कहा है की अपने शरीर की विनाश से रक्षा करना सर्वोच्च धर्म का एक अंग है। शारीरिक संगरक्षण का एक मात्र आधार शक्ति है।  विश्वामित्र के बारे में बताया जाता है की एक बार बड़े आकाल के समय उन्हें कई दिनों तक भोजन नहीं मिला।  एक दिन उन्होंने एक चांडाल के घर में एक मर्त कुत्ते की सड़ती हुयी टाँग  पड़ी देखी।  विश्वामित्र ने झपट कर उसे ले लिया और परमात्मा को भोग लगा कर उसे खाने को सिद्ध हुये। चांडाल विस्मय से बोलै "तुम कुत्ते की टाँग कैसे खा रहे हो ?"  विश्वामित्र ने उत्तर दिया, " संसार में तपस्या और सत्कर्म करे के लिये मुझे पहले जीवित रहना हो और शकितशाली होना आवश्यक है." 

 परन्तु पिछले कुछ दशकों में हमारे देश में जो विचार रहा है उसमें शक्ति को पापपूर्ण और गर्हित माना जाता रहा है। अहिंसा के गलत अर्थ लगाने के कारण राष्ट्र के मस्तिष्क की विवेचन शक्ति समाप्त हो  गयी है।  हमलोग शक्ति को हिंसा मानने लगे हैं तथा अपनी दुर्बलता को गौरववात्सव समझने लगे हैं। 

जो हिंसा करने में पर्याप्त समर्थ है परन्तु जो संयम , विवेक और दया के कारन ऐसा नहीं करता केवल उसी व्यक्ति के लिये यह कहा जा सकता है की वह अहिंसा का आचरण करता है, और कोई दुसरे के लिये नहीं।  

"ह्रदय में हो प्रेम लेकिन, शक्ति भी कर में प्रबल हो , 
यह सफलता मंत्र है,करना इसी की साधना"

No comments: