रिश्तों की इस दौड़ में घायल पडी हूँ ,
सब कुछ करने के बाद भी तन्हां खड़ी हूँ..
हर वक़्त तुम्हें समझने में लगा दिया,
आज खुद को समझ ने में नाकाम खड़ी हूँ ...
नये रिश्तों को बडे प्यार से संभाला हमने ,
पर जो कदर करे उसकी कदर कहाँ हुयी है ...
मन में प्यार की जगह आक्रोश ने ली है ,
बडे प्रयत्न किए पहले अब और करना नहीं है..
बस अब बहुत हुआ अब और झुकना नहीं है,
तुम्हारी गलती है तुम्हें समझना होगा...
मुझे अब और इसे संभालना नहीं है ,
मुझे अब और तुम्हें ढोना नहीं है...
तुम्हारी गलतियों के साथ जीना नहीं है ...
मुझे अब और पत्थर बनना नहीं है..
मन इतना घायल है की मुझे कुछ सुनना नहीं है..
अब बस मुझे और तुम्हें रोकना नहीं है ..
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